Wednesday, January 20

बंगाल चुनाव 2021:जब ममता ने सोनिया गांधी से कहा था- ‘मेरी तृणमूल मुंहतोड़ जवाब देगी’

  • दोनों के रिश्तों की ताबूत में आखिरी कील तब लगी जब 2016 में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी का गठबंधन प्रस्ताव ठुकरा दिया
  • 2012 में ममता बनर्जी बंगाल की CM बनी, उन्हें उम्मीद थी कि सोनिया और राहुल शपथ ग्रहण में शामिल होंगे, लेकिन वो नहीं आए

ममता बनर्जी से मिलने के बाद दो दशक तक चले राजनीतिक ऊहापोह, ऊंच-नीच के बीच सोनिया को इस बात का तो अंदाजा था कि ममता बनर्जी एक बड़ी नेता हैं। सोनिया ने तो ममता बनर्जी के लिए तब 10, जनपथ के दरवाजे आधी रात को खोल दिए थे जब वो खुद भी राजनीति में नहीं आईं थीं। वो दिसंबर 22, 1997 की कड़कड़ाती रात थी। सोनिया गांधी ने एक आखिरी कोशिश की थी ममता बनर्जी को कांग्रेस में रोकने की।

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने सोनिया गांधी की गुजारिश सुनने से इनकार कर दिया था। ममता ने सोनिया को बताया था कि किस तरह प्रणब मुखर्जी ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। राजीव गांधी से अपने अच्छे रिश्तों का हवाला देते हुए ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से कहा, ‘आपकी कोशिश के सम्मान में मैंने नौ दिन इंतजार किया लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। सीताराम केसरी ने मुझे मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने के लायक नहीं समझा केवल प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया। मेरी तृणमूल कांग्रेस इसका करारा जवाब देगी।’

उस दौर में ममता बार-बार कहती थीं कि अगर सोनिया गांधी पार्टी की कमान संभालती हैं तो वे कांग्रेस में फिर से शामिल होंगी। लेकिन, मार्च 1998 में सोनिया ने जब कांग्रेस की कमान संभाली तब ममता पार्टी छोड़कर जाने वालों की सुप्रीम लीडर बन चुकी थीं। सालों तक, सोनिया का मानना था कि ममता वो कर सकती हैं जो उनके बंगाल के लोग नहीं कर सकते। वो राज्य से वाम दलों को बाहर निकाल सकती हैं।

लेकिन इससे परे, तृणमूल प्रमुख के साथ उनकी एक पर्सनल बॉन्डिंग भी थी। करीब 22 साल पहले दोनों का एक दूसरे के लिए स्नेह सार्वजनिक रूप से दिखा था। जब ममता ने राष्ट्रपति भवन में एनडीए की मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद सामने की पंक्ति में बैठीं सोनिया की तरफ कदम बढ़ाए। दोनों एक दूसरे से गले मिलीं। जिसे देखकर अटल-आडवाणी जैसे नेता हैरान रह गए। तब सोनिया ने ममता को बधाई दी और कहा कि क्या वो वापस कांग्रेस में लौटेंगी..? दोनों ने महसूस किया कि यह निमंत्रण सिर्फ भावनात्मक है और ममता आगे बढ़ गईं। बाद में ममता ने सोनिया गांधी का एहसान चुकाया। उन्होंने नई सरकार की पहली ही कैबिनेट मीटिंग में उस प्रस्ताव को रोकने में मदद की जिसमें कहा गया था कि विदेशी मूल के लोग उच्च पदों पर आसीन नहीं हो सकते।

साल 2000 में तहलका टेप केस के बाद ममता बनर्जी ने NDA कैबिनेट की रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन किया। हालांकि कामयाबी नहीं मिली और प्रदेश में लेफ्ट की सरकार बनी। प्रणब मुखर्जी से अनबन के बाद ममता ने 2004 लेफ्ट के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने महाजोत एलायंस बनाया और फिर से NDA में शामिल हो गईं। इस बार वो कोयला मंत्री बनीं। मई 2004 में लोकसभा के चुनाव हुए और NDA को हार का सामना करना पड़ा। लेफ्ट ने UPA को समर्थन दिया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। ममता बनर्जी सत्ता से बाहर हो गईं। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया।

UPA-2 के दौरान कई चीजें गलत हुईं। कांग्रेस के साथ TMC का रिश्ता और भी खराब हो गया। ममता ने 2011 में कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 2012 में बंगाल में विधानसभा के चुनाव हुए, TMC को बंपर सफलता मिली। 34 साल बाद लेफ्ट सत्ता से बाहर हो गई। लेकिन कांग्रेस इससे प्रभावित नहीं हुई। ममता बनर्जी को उम्मीद थी कि शपथ ग्रहण समारोह में सोनिया गांधी और राहुल गांधी शामिल होंगे। लेकिन राज्य स्तर के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय नेताओं को नहीं जाना चाहिए के तर्ज पर दोनों शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए।

इसको लेकर ममता बनर्जी को काफी तकलीफ पहुंची। उन्हें सोनिया से ऐसी उम्मीद नहीं थी। ऐसा माना गया कि प्रणब मुखर्जी ने ही सोनिया गांधी को कोलकाता नहीं जाने की सलाह दी थी। लेकिन कांग्रेस के पुराने समय के लोग अब इस बात से पीछे हटते हैं और आश्चर्य करते हैं कि अगर राहुल ने ममता के साथ व्यक्तिगत तालमेल बनाया होता, तो बंगाल की राजनीति और शायद राष्ट्रीय राजनीति में भी कांग्रेस के लिए बेहतर होता।

रिश्तों की ताबूत में आखिरी कील तब लगी जब 2016 में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी का गठबंधन प्रस्ताव ठुकरा दिया। नीतीश के घर पर हुई इस मुलाकात में ममता ने राहुल को लेफ्ट के बजाय तृणमूल से गठबंधन करने की सलाह दी थी। राहुल ने तब ममता बनर्जी का प्रस्ताव मान लिया होता तो आज बंगाल में कांग्रेस गठबंधन की सरकार होती।

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