Sunday, November 29

क्या पार्टी बदलने से अपने मूल स्वरूप को खो देंगी पार्टियां ?

इन दिनों राजनीति का नया रुप दिखाई दे रहा है ।कल तक जो , जिस पार्टी को कोसा करते थे ।उनकी नीतियों की आलोचना करते थे । देश की जनता को दहाड़ – दहाड़ कर बताया करते थे ।आज वो अपने स्वार्थ के लिए उसी पार्टी की चौखट पर बैठे नजर आ रहे है । इतना ही नहीं ये उस पार्टी के लिए भी यह बात सोचने मजवूर होना पडेगा जो राजनैतिक व्यक्ति उनकी विचारधारा में प्रवेश कर रहा है वह कल तक उनकी विचारधारा की आलोचना करता था ।ऐसे में क्या राजनैतिक पार्टियां अपनी विचारधारा को बचा कर रख पायेंगी।

आज राजनैतिक पार्टियों का मूल मकसद सिर्फ सत्ता पाना ही रह गया है । इसके लिए चाहे उन्हें किसी भी हद तक जाना पढे । इतना ही नहीं जिस पार्टी ने उन्हें इतने दिनों तक मान सम्मान दिया ओर उन्होंने भी पार्टी की खातिर एक ईमानदार कार्यकर्ता की तरह पार्टी को समय दिया फिर अचनाक पार्टी छोडकर उस पार्टी के साथ खडे हो जाना जिसके खिलाफ कल दहाडे मार रहे थे।

दल बदलना का काम कोई एक नेता या पार्टी नहीं कर रही यह आज की राजनीति का चरित्र हो गया है । ऐसे में फिर वही सवाल ,राजनैतिक पार्टी अपने मूल स्वरूप को कैसे बचा पायेंगी । इसका ताजा उदाहरण है ।महाराष्ट्र का राजनैतिक गठबंधन की सरकार का भी दिखाई दे रहा है । जो हिन्दू विचारधारा बाली पार्टी एक विचारधारा बालों के साथ चुनाव लडती है ओर बाद में अपनी महात्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उस पार्टी के साथ सत्ता की मलाई खाने लगते है जिसे उनके पिता श्री गालियां दिया करते थे ।आज का राजनैतिक व्यक्ति इतना गिर गया है । वह अपने पिता के सिद्धांतों को तक ताक पर रख देता है ।ऐसे में कहां रह जाते है पार्टी के मूल सिद्धांत ।

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