Sunday, September 27

लोंगेवाला की एक रात

6f-Indo-par-longewala-war-746 1971 में भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था। भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते अब तक भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी ही थी कि इंडियन एयरफोर्स से मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे।जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।5 दिसंबर के दिन दुश्मन को खदेड़ते हुए पाकिस्तान के अंदर 8 किलोमीटर तक जा घुसे थे भारतीय सैनिक। 16 दिंसबर तक सैनिकों वहीं पर डेरा जमाए रखा। वहीं खाना बनता और वहीं पर खाते। जबकि पाकिस्तानी बिग्रेड इस इरादे के साथ भारत की ओर बढ़ी थी कि 5 दिसंबर को उनका नाश्ता लोंगेवाला में होगा, दोपहर का खाना रामगढ़ में और रात का खाना जोधपुर में। 16 दिसंबर तक भारत ने जंग जीत ली।

चेकपोस्ट के पास जवानों ने एक 10 बाय 10 का मंदिर बना रखा था। जंग में बुरी तरह क्षति हुई थी, चेकपोस्ट जल कर ख़ाक हो गई थी मगर मंदिर को आंच तक नहीं आई। युद्ध के बाद इंदिरा गांधी समेत तत्कालीन सेंट्रल मिनिस्टर जगजीवन राम, वीसी शुक्ला, बीएसएफ डायरेक्टर अश्वनी कुमार, राजस्थान के गवर्नर और मुख्यमंत्री सभी मंदिर को देखने आए। सभी को इस बात का आश्चर्य था कि इतने नुकसान के बावजूद मंदिर कैसे सलामत है। यह दुनिया की पहली ऐसी जंग थी जो सिर्फ 13 दिन तक ही लड़ी गई। 16 दिसंबर 1971 के दिन पाकिस्तान ने 90000 सैनिकों के साथ हिंदुस्तान के आगे सरेंडर किया था। इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।’

 

comments