दिनांक 18 December 2017 समय 1:11 AM
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सुरक्षित सीट के मतदाता क्या मूर्ख होते हैं

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भोपाल। आज लोकसभा चुनाव की सरगर्मी पूरे देश में दिखाई दे रही है। कोई चुनावों को लेकर उत्साहित है तो कोई हतोउत्साहित दिखाई दे रहा है। आराम गयाराम का खेल भी देश की सभी पार्टियों में चल रहा है। सत्ता कि मलाई खाने के लिए उम्र भी बाधा नहीं बन रही है। कोई टिकिट पाना चाहता है तो कोई टिकिट कटवाना चाहता है और कोई अपनी मनपसंद सीट की तलाश में है। और इन सब से हटकर कोई सुरक्षित सीट की तलाश मेें है।
इन सब राजनैतिक कार्यक्रमों के चलते कई बातें समझ में आती हैं जैसे कोई पार्टी बदल रहा है तो उसकी अपनी महत्वाकांक्षा दिखाई देती है। 80 के पार होने के बावजूद भी टिकिट की लाईन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। उनकी भी सत्तालोलुप्ता दिखाई दे रही है। कोई मनपंसद सीट चाहता है तो उस पर भी यह समझा जा सकता है कि वह उस जगह पर जनता के बीच में काम करते होंगे या जनता के विश्वसनीय होंगे। पर ये सुरक्षित सीट का मामला समझ से परे है। बड़ी राजनैतिक पार्टियों के बड़े नेता जो देश में आए दिन बेतुकी बातें किया करते हैं उन्हें जनता के बीच जाने से डर क्यों लगता है आखिर सुरक्षित सीट का क्या मतलब होता है। जिस सीट से वह आसानी से जीत जाऐं या फिर जिस सीट से उन्हें जीत मिल रही है वहां के नागरिक अपने अधिकारों के प्रति प्रश्र न करें। या सुरक्षित सीट का मतलब वहां की जनता मूर्ख है कि चुनाव के वक्त आ कर लंबी लंबी बातें और विकास के नाम पर कुछ नहीं है। यही बात आज दो महीने से समाचार पत्रों की सुर्खियां बना हुआ है कि फला नेता सुरक्षित सीट की तलाश में है।
इस सब से ऐसा लगता है कि देश के कर्णधार उस जगह की तलाश में रहते हैं जहां की जनता बगैर कोई प्रश्र किए चुपचाप उनकी लच्छेदार बातों में आकर अपने मत का प्रयोग उनके पक्ष में करते चले जाएं। क्षेत्र के विकास से उनका कोई संबंध न हो, क्षेत्र की समस्याओं के प्रति भले ही वह गंभीर न हों, क्षेत्र की जनता से भले ही उनका जुड़ाव न हो इनता ही नहीं भले ही वो उस क्षेत्र के न हों पर मतदाता परमपरागत वोटर के रूप में जाना जाता हो इसी को सुरक्षित सीट समझी जाती है। इसीलिए सत्ता के लोलुप्त लोग ऐसी ही सीटों की तलाश में रहते हैं जिसमें बगैर कोई मेहनत, बगैर कोई जबावदारी, बगैर कोई आश्वासन के फतेह हांसिल हो जाती है। देश में इस तरह की कई सीटें हैं जिसमेंसे विदिशा की सीट भी इसी श्रेणी में मानी जाती है।

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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