दिनांक 19 December 2018 समय 2:42 PM
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बिहार का राजनीतिक ड्रामा

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bबिहार में इन दिनों एक विचित्र राजनीतिक संकट पैदा हो गया है। पिछले दिनों सत्तारूढ़ जेडीयू ने नेतृत्व परिवर्तन का फैसला किया। कुल 111 में से 97 विधायकों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की जगह नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुन लिया गया। मुख्यमंत्री मांझी के पास अधिकतम 14 विधायकों का ही समर्थन बचा, लिहाजा कायदे से उनको अपना पद छोड़ देना चाहिए था। लेकिन, उन्होंने इस बैठक को ही अवैध बताते हुए पार्टी का फैसला मानने से इनकार कर दिया। उनकी दलील थी कि विधायक दल की बैठक मुख्यमंत्री ही बुला सकता है। पटना हाइकोर्ट ने उनके इस दावे को सही ठहराते हुए नीतीश को जेडीयू विधायक दल का नेता चुने जाने के फैसले पर रोक लगा दी है। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब नीतीश अपने साथ 130 विधायक लेकर दिल्ली आए हुए हैं। उधर संभवत: बीजेपी का आश्वासन पाकर मांझी भी मोर्चे पर डटे हुए हैं। राज्य में राजनीतिक संकट पैदा होने के बाद वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल चुके हैं। उसके पहले भी बीजेपी के कई सीनियर लीडर मांझी की तारीफ करते रहे हैं। लेकिन, बीजेपी की कुल संख्या को मिलाकर भी मांझी कागजी हिसाब में बहुमत से दूर ही नजर आते हैं। अगर वह जेडीयू से अलग होने का फैसला करते हैं तो अपनी पार्टी को विधानसभा में अलग दल की मान्यता दिलाने के लिए कम से कम एक तिहाई यानी 37-38 विधायकों का समर्थन उनके पास होना चाहिए। गौरतलब है कि पिछले साल लोकसभा चुनाव में जेडीयू के कमजोर प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर सरकार का नेतृत्व जीतन राम मांझी को सौंप दिया था। लेकिन, कुछ ही समय बाद मांझी जिस तरह बात-बात में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करने लगे उससे संदेह बढ़ा। केंद्र और कई राज्यों में अपनी जीत से उत्साहित बीजेपी ने जेडीयू के आंतरिक संकट का लाभ उठाना चाहा और इसके लिए मांझी की महत्वाकांक्षा को हवा दी। मांझी को लगा कि वह बीजेपी के सहारे अपनी रबर स्टैंप छवि से मुक्त हो सकते हैं। लेकिन, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि गवर्नेंस के मोर्चे पर उनका रेकॉर्ड अच्छा नहीं रहा। विकास कार्य ठप पड़ने लगा और कानून-व्यवस्था भी बिगड़ती गई। ऊपर से मांझी के विवादास्पद बयानों ने सरकार की इमेज और खराब की। ऐसे में उपचुनाव के समय हाथ मिला चुके लालू-नीतीश को लगा कि जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले जनता के मन में उनकी सरकार की एक अच्छी छवि होनी चाहिए। नीतीश को फिर से बागडोर सौंपने का फैसला इसी चिंता के तहत किया गया। लेकिन, बिहार की सोशल इंजीनियरिंग ने दलितों के बीच भी एक नई चेतना जगाई है। अब यह वर्ग दूसरों के पीछे चलने के बजाय खुद अपनी लीडरशिप चाहता है। मांझी इसी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इसका असर बिहार की राजनीति पर आगे भी दिखेगा।

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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