दिनांक 27 April 2018 समय 2:16 PM
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बैंकों को पैसे की जरूरत, जानि‍ए किन पीएसयू में सरकार बेच सकती है अपनी हि‍स्‍सेदारी

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disinvest_1423311848नई दि‍ल्‍ली। फंसे कर्ज की मार झेल रहे हैं बैंकों को इस वक्‍त बड़ी मात्रा में पूंजी की जरूरत है। 10 जुलाई 2014 को कि‍ए फैसले के बाद 7 फरवरी 2015 को केंद्र सरकार ने नौ सरकारी बैंकों को 6,990 करोड़ रुपए देने की बात कही। हालांकि‍, बेसल 3 मानकों और बढ़ते एनपीए को देखते हुए यह राशि‍ नाकाफी है। ऐसे में सरकार की ओर से मि‍लने वाली राशि‍ के अलावा वि‍नि‍वेश के जरि‍ए भी पूंजी जुटाने की योजनाओं को बजट बाद अमल में लाया जा सकता है।

माना जा रहा है कि‍ सरकार पब्लिक सेक्टर के हरेक बैंक से सब्सिडियरीज में अपने और बैंक के शेयरों को रखने के लिए अलग होल्डिंग कंपनी बनाने को कह सकती है। केंद्र इन बैंकों में आगे चलकर अपना कंट्रोलिंग स्टेक खत्म करना चाहता है और इस दिशा में यह पहला कदम हो सकता है।
कि‍स बैंक में सरकार की कि‍तनी हि‍स्‍सेदारी
देश के सबसे बड़े बैंक स्‍टेट बैंक ऑफ इंडि‍या (एसबीआई) में सरकारी की हि‍स्‍सेदारी 59.87 फीसदी है। पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में यह हि‍स्‍सा 58.87 फीसदी का है। बैंक ऑफ बडौदा (बीओबी) में सरकार की वर्तमान हि‍स्‍सेदारी 56.26 फीसदी है।

बैंक सरकार की हि‍स्‍सेदारी (फीसदी में)
एसबीआई 59.87
पीएनबी 58.87
बैंक ऑफ बडौदा 56.27
केनरा बैंक 69
सिंडि‍केट बैंक 67.39
इलाहाबाद बैंक 58.90
देना बैंक 58.01
इंडि‍यन बैंक 81.51
यूनियन बैंक 60.47
यूको बैंक 77.20
बज चुकी है खतरे की घंटी
सेंट्रल बैंक ने चेताया है कि‍ बैंकों का ग्रॉस एनपीए मार्च 2015 तक 7 फीसदी पर पहुंच सकता है। आरबीआई की रि‍पोर्ट में कहा है कि‍ अगर आर्थि‍क सुधार और पीएसयू बैंकों के सरकारी हि‍स्‍सेदारी कम होने पर यह 4.4 फीसदी पर पहुंच सकता है। रीस्‍ट्रक्‍चरिंग लोन और राइट लोन के साथ-साथ एनपीए का अनुपात पहले ही 12 फीसदी को पार कर चुका है। यह पहले ही खतरे की घंटी बजा चुका है। वरि‍ष्‍ठ बैंकर ने कहा, ‘अगर सरकार कई तरह के सुधार लेकर भी आती है तो भी डि‍फॉर्ल्‍ट की भुगतान क्षमता में इतनी जल्‍दी बदलाव नहीं आएगा।’
भाजपा पहले भी चाहती थी हि‍स्‍सेदारी बेचना
वर्ष 2001 में भी राजग सरकार ने सरकारी बैंकों में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी को घटाने का मन बनाया था, लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सका था। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली राजग सरकार ने पीएसयू बैंकों में केंद्र की हिस्सेदारी का स्तर घटाकर 33 फीसदी करने का कैबिनेट नोट भी तैयार कर लिया था। यह अलग बात है कि उसे पारित नहीं किया जा सका था
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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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