उत्तराखंड तबाही में बिछड़ गई थी पत्नी, खोज निकाला | BetwaanchalBetwaanchal उत्तराखंड तबाही में बिछड़ गई थी पत्नी, खोज निकाला | Betwaanchal
दिनांक 19 July 2019 समय 6:10 PM
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उत्तराखंड तबाही में बिछड़ गई थी पत्नी, खोज निकाला

अलवर

हिम्मत नहीं हारने वालों की अंत में जीत होती ही है। इस बात को एक बार फिर सच साबित किया है ट्रैवल कंपनी में काम करने वाले विजेंद्र सिंह ने। विजेंद्र जून 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण तबाही में अपनी पत्नी से बिछड़ गए थे। उनकी पत्नी को मृत घोषित कर दिया और रिश्तेदारों ने उम्मीद छोड़ दी। लेकिन, विजेंद्र ने हार नहीं मानी और तब से लगातार उन्हें ढूंढ रहे थे। 19 महीने बाद विजेंद्र की पत्नी लीला 27 जनवरी को हिमालय की गोद में एक गांव में मिलीं 

अलवर के भीखमपुरा गांव में रहने वाले विजेंद्र बताते हैं, ’12 जून 2013 को मैं ओर मेरी पत्नी अपनी ही ट्रैवल कंपनी की बस से 30 यात्रियों के साथ चार धाम की यात्रा के लिए निकले थे। केदारनाथ में त्रासदी के बाद 16 जून को उनसे मेरी अंतिम बार बात हुई थी।’

उन्होंने कहा, ‘उस समय से मैं उत्तराखंड में ही रह रहा हूं और पत्नी की तलाश में हजारों गांवों में गया। मुझे भगवान और नसीब पर पूरा भरोसा था कि वह जिंदा हैं और एक बार हम फिर मिलेंगे। मैं जहां भी जाता ग्रामीणों को अपनी पत्नी की तस्वीर दिखाता। 27 जनवरी को गंगोली गांव के लोगों ने बताया कि उन्होंने मानसिक रूप से अस्थिर महिला को देखा है, जो मेरी पत्नी जैसी दिखती हैं। वक्त के थपेड़ों ने उसे इतना बदल दिया था कि पहचानना भी कठिन था, लेकिन मैंने लीला को देखते ही पहचान लिया। डेढ़ साल की यह तलाश काफी दर्दनाक रही।’

45 साल के विजेंद्र बताते हैं, ‘मेरे परिवार के लोगों ने भी कहा कि मैं अब लौट जाऊं, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। कई लोग मानने लगे कि मैं पागल हो गया हूं। आधिकारिक रूप से वह मर चुकी थीं और मेरे परिवार को 9 लाख रुपये का मुआवजा भी मिल चुका था।’ पत्नी की खोज के दौरान कई गांवों में जहां सराय या होटेल नहीं थे, विजेंद्र को सड़कों पर रात बितानी पड़ी। हालांकि, पत्नी से मिलने के बाद पिछले दिनों के कष्ट का मलाल जाता रहा।

वह बताते हैं, ‘लीला बुधवार को अलवर स्थित घर पहुंचीं तो बेटा सागर मां को देखते ही रोने लगा। मेरी पत्नी की स्थिति अभी उतनी अच्छी नहीं है और वह लोगों से बात नहीं कर रही हैं।’ बेटा सागर ने बताया, ‘मेरी मां को कुछ भी याद नहीं है, लेकिन जब मेरी बहन और बहनोई जाने लगे तो उन्होंने तिलक लगाकर विदाई दी। इसलिए हम लोगों ने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है।’

विजेंद्र, उनकी बेटिंया राज लक्ष्मी, पिंकी, पुष्पा और सीमा देवी के साथ-साथ सागर भी लीला के ठीक होने की भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। विजेंद्र बताते हैं, ‘हम उनसे पुरानी घटनाओं की बातें नहीं कर रहे हैं बल्कि चीजों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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