दिनांक 16 October 2018 समय 5:11 PM
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blog- चिकित्सा शिक्षा में सुधार कैसे हो?

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medical hall“चिकित्सा एक विज्ञान है और केवल मजबूत चिकित्सा शिक्षा की नींव पर ही सफल चिकित्सा की जा सकती है।“

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वर्ष 1909 में अमेरीका में चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक परिषद का गठन किया गया था। परिषद ने कार्नेगी फाउंडेशन से अनुरोध किया कि वह इस कार्य का नेतृत्व करे। कार्नेगी ने इस सर्वेक्षण का नेतृत्व करने के लिए एक स्कूल टीचर और शिक्षाविद् इब्राहीम फ्लेक्सनर को नियुक्त किया। वर्ष 1910 में फ्लेक्सनर ने सभी 150 मेडिकल कॉलेज का सर्वेक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी। उनकी रिपोर्ट ने आवश्यक बुनियादी ढांचे को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य शिक्षा से संबंधित कॉलेजों की संख्या को 150 से घटाकर 31 पर ला दिया।

इसके साथ ही अमेरिकन मेडिकल शिक्षा को बदल दिया गया और तबसे फिर उसने पीछे मुडकर नहीं देखा

एक शताब्दी बाद भारतीय मेडिकल कॉलेजों में भी इस तरह के बदलाव की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि भारत में भी अब संख्या में लगातार बढ़ते जा रहे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों पर रोक लगनी ही चाहिए और उन्हें बंद करके सिर्फ सीमित संख्या वाले क्वालिटी परक कॉलेजों को मान्यता मिलनी चाहिए।

 

सच्चाई यह है कि अब भी समृद्ध घरों के बच्चे ही प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेते हैं। ग्रामीण इलाकों के बहुत कम ही बच्चे इनमें प्रवेश ले पाते हैं। समाज की तरफ से भी यह अवधारणा है कि जो चिकित्सक है वह रईस होगा, उसके पास गाड़ी होगी, वह बड़े से मकान में रहता होगा। अब इतना सब तो सिर्फ शहरों में काम करने से ही मिलेगा, ग्रामीण इलाकों में तो लोग इतना इलाज में खर्च नहीं कर पाएंगे और वहां रहने पर चिकित्सक की जीवन शैली भी उतनी समृद्ध नहीं हो पायेगी। फलतः ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य कारने वाले चिकित्सकों के मन में भी धीरे-धीरे अवसाद वाली भावना आने लगती है।

 

हालांकि जब छात्र इस शिक्षा से जुड़ते हैं तब प्रारम्भ में वे सेवा भाव से ही अध्ययन करते हैं किन्तु 5 साल के अंत तक आते-आते वे भी समाज की पूर्व निश्चित अवधारणा में बहने लगते हैं और वे शहरी इलाकों की तरफ रहने का मन बना चुके होते हैं। चिकित्सा स्वास्थ्य प्रशिक्षण शायद और अधिक शहरी हो गया है। यह सिर्फ डॉक्टर व इन्वेस्टिगेशन के चारों तरफ केन्द्रित होकर रह गया है जिसे अब जन साधारण की देखभाल करने की कोई इच्छा नहीं है। नए डॉक्टर अब शहर की तरफ जा रहे हैं, उनका प्रशिक्षण उन्हें शहरों में काम करने के लिए और सिर्फ उनके ही क्षेत्र में काम करने के लिए तैयार कर रहा है।

 

भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता –

 

1- जैसा कि हम जानते हैं, चिकित्सा विज्ञान सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है जो कि आज बहुत ही चिंताजनक स्थिति में है, इसके गिरते स्तर के कारण हम भारी कीमत चुका रहे हैं। देश के अधिकतर क्षेत्रों में आज ढहते हुए चिकित्सा केन्द्रों में स्वास्थ्य सेवा देने के लिए अच्छे चिकित्सक और उनके सहकर्मी नहीं जाना चाहते हैं।

 

2- यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की बात की जाए तो शहरी और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में बहुत अंतर पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र बहुत दूर-दूर तक भी नहीं पाए जाते हैं।

 

3- इसके साथ ही आजकल आवश्यकता से अधिक टेस्ट कराये जाते हैं और साथ ही साथ बहुत अधिक दवाइयां भी लिख दी जाती हैं। जब तक रोगी सारे टेस्ट करवाकर लाता है तब तक उसकी बीमारी और भी बढ़ चुकी होती है। साथ ही साथ वह शारीरिक व मानसिक रूप से भी कमज़ोर हो चुका होता है।

 

4- भोर कमिटी की रिपोर्ट 1946 के आधार पर भारत सरकार ने आज़ादी के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था में तीन स्तरीय चिकित्सा प्रणाली की व्यवस्था की – प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक। इस प्रणाली के कार्यान्वन के लिए हमें पूरी तरह से प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता है जो इन तीनों स्तरों पर कार्य को संभाल सके। लगता है समय के साथ-साथ हम लोग अपने लक्ष्य से कहीं भटक गए।

 

5- आजकल चिकित्सक ग्रामीण इलाकों में कार्य नहीं करना चाहते हैं। इस गंभीर समस्या के कई कारण हैं, जैसे काफी कम वेतन, अच्छा काम करने वालों को बीच बीच में प्रोत्साहन की कमी, स्थानांतरण की गलत नीतियां, पदोन्नति की कोई पक्की नीति न होना, किसी के भविष्य को सवारने की नीति का पूरी तरह से न होना, किसी का सपॉर्ट न होना। इन सभी समस्याओं को दूर करना भी ज़रूरी है। हालांकि यह समस्या इतनी गंभीर है कि इसे पूरी तरह से दूर करना निकट भविष्य में कठिन है।

 

6- इन सब कमियों के बावजूद, पिछले 60 वर्षों में शिशु मृत्यु दर को 120 से 70 तक व मातृ मृत्यु दर को 840 से 407 तक नीचे लाया गया है। हालांकि कुछ राज्यों में अच्छा काम भी हुआ है, जैसे केरल और तमिलनाडु में शिशु मृत्यु दर 17 है व उत्तर प्रदेश व बिहार में यह 100 है।

 

7- इन आंकड़ों से यह प्रतीत होता है की यह अलग-अलग राज्यों में व्यक्तियों और समुदायों के कार्य का परिणाम है, न कि सरकारी व्यवस्था का। यह हमारी प्रणाली की विफलता है जिसे जल्द से जल्द पहचानना और दूर करना आवश्यक है।

 

8- नर्सों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में सही योजना का अभाव नज़र आता है – मात्रा और गुणवत्ता दोनों में हमारे देश में डॉक्टर व नर्स का अनुपात है 1:1.35 जबकि विकसित देशों में यह अनुपात 1:3 है।

 

9- चिकित्सक व जनसंख्या का अनुपात 1:1722 है। ऐसे परिदृश्य में ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी मलिन बस्तियों में रहने वाले अधिकांश लोगों को प्राथमिक माध्यमिक या तृतीयक किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाती और इस कारण उन्हें स्वैच्छिक एजेंसियों या प्रतिबद्ध गैर सरकारी संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारे मेडिकल कॉलेजों में दिए जा रहे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि मेडिकल कॉलेजों के वातावरण को राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके।

 

10- स्वास्थ्य पर हो रहे कुल व्यय का 83% निजी क्षेत्र में जा रहा है इसलिए हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रमुख प्रभाव भी निजी क्षेत्र का ही पड़ता है। निजी क्षेत्र में काम कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों ने अधिक मुनाफा कमाने की चाह में एक ऐसी चिकित्सा व्यवस्था बना दी है जिसमें चिकित्सा के लिए अधिक लागत वाले उपकरण व तकनीकों की आवश्यकता होने लगी है।

 

11- इसके अतिरिक्त मेडिकल कॉलेजों की एक बहुत बड़ी संख्या छह राज्यों में ही केंद्रित होकर रह गयी है (महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और गुजरात)। इन राज्यों में 63% मेडिकल कॉलेज और कुल सीटों में से 67% सीटें हैं।

medical education

 

मेडिकल काउंसल्स में विरोधाभासी स्थिति –

1- इस समय हमारे देश में दो मुख्य अलग-अलग काउंसल हैं। एक MCI जो ऐलोपथिक चिकित्सा प्रणाली को दिशा-निर्देश देता है, दूसरा CCIM जो भारतीय चिकित्सा प्रणाली के दिशा-निर्देश निर्धारित करता है। इससे हुआ यह कि दो अलग चिकित्सा प्रणाली बन गयी हैं जो अपने अलग तरीके से कार्य करना चाहती हैं।

 

2- रोगियों की ज़रूरतों को महत्व देते हुए यह दोनों आपस में सामंजस्य नहीं करना चाहतीं। रोगी को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाने के लिए एक दूसरे से यह सलाह नहीं करतीं। अपने अलग अभिमान में रहकर यह दोनों काम करती हैं। इसके कारण भोर कमिटी, चोपड़ा कमिटी और दवे कमिटी के सुझावों को भी एक किनारे रख दिया गया है।

 

3- जब भी कोई चिकित्सा सुधार प्लानिंग होती है, उसमें आधुनिक चिकित्सा सुधार के लिए भारी भरकम बजट रख दिया जाता है पर भारत की अपनी पद्धति आयुर्वेद के शिक्षण स्तर में सुधार के लिए शायद ही कोई ठोस उपाय किया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि आयुष पद्धति के अधिकांश चिकित्सक अब भी ग्रामीण और छोटे शहरी जगहों में कार्य करके लोगों की सेवा कर रहे हैं।

 

ऐलोपैथी शिक्षण में सुधारों के उपाय तो हम मीडिया और अखबारों के माध्यम से जानते रहते हैं। हालांकि आयुष चिकित्सा शिक्षण में सुधार करने के उपाय शायद ही प्रकाश में आते हों।

 

मेरे विचार से निम्न बातों पर तुरंत ही कार्य करना आवश्यक है –

 

1- इस निराशाजनक परिदृश्य में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र विशेषकर आयुष शिक्षा में सुधारों की आवश्यकता है जिससे स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ जन साधारण तक पहुंचाया जा सके। चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण क्योंकि अंत में उसी को देश की अर्थव्यवस्था में सुधार करना है। यही अच्छी चिकित्सा शिक्षा का लक्ष्य है। इस समय यदि देखा जाए तो देश के कुछ चिकित्सा संस्थानों के अतिरिक्त अन्य सभी में स्वास्थ्य उन्मुख शिक्षा, दिशाहीन, अनियमित और गैर मानकीकृत है।

 

2- इस समय ज़रूरत इस बात की है कि नर्सिंग और पैरा मेडिकल शिक्षण में कार्यरत लोगों की संख्या बढ़ाई जाए। हमारी स्वास्थ्य चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी कमी यह है कि हमारे पास ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले चिकित्सक, नर्स आदि की भारी कमी है।

 

3- इस समय एक एजेंसी की आवश्यकता है जो पूरी स्वास्थ्य प्रणाली के कार्यों पर हर समय नज़र रखे और निजी व सरकारी व्यवस्था का बेहतर उपयोग किया जा सके। अगर मेडिकल कॉलेज सेवा परक शैक्षिक वातावरण न उत्पन्न कर सके तो कुछ समय बाद डॉक्टरों के लिए चिकित्सा मात्र एक व्यवसाय बनकर रह जाएगा जो इसका प्रयोग पैसा व प्रतिष्ठा कमाने के लिए करेंगे, सेवा करने के लिए नहीं।

 

4- आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय चिकित्सा पद्दति को ग्रैजुएट, पोस्ट ग्रैजुएट और शोध के क्षेत्र में दृढ़ किया जाये जिससे हम अपनी हेरिटेज को संभाल सकें।

 

5- आधुनिक बायो साइंस के क्षेत्र में कार्य करने के लिए दोनों विधियों के ज्ञान को एक साथ लेकर चलना होगा। ऐसे तरीको को बनाना चाहिए जिससे नए शोध कार्य और पुराने ज्ञान से लाभ लेकर विधिवत तरीके से पूरी तरह से प्रशिक्षित चिकित्सकों को ज्ञान दिया जा सके।

 

6- सच्चाई यह है कि आयुष शिक्षा चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम को वर्षों से नवीनीकृत नहीं किया गया है और न ही पब्लिक हेल्थ की प्लानिंग पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही पाठ्यक्रम में रिसर्च बेस्ड ज्ञान को नए तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा रहा जिससे युवा इस फील्ड में आने से अब कतरा रहे हैं। मेरा मानना है कि पुराने आयुष पाठ्यक्रम में नए विषय जोड़े जाने चाहिए, जैसे जराचिकित्सा, पब्लिक हेल्थ, आपातकालीन चिकित्सा, खेल चिकित्सा, क्रिटिकल केयर, आघात देखभाल आदि।

 

7- आयुष चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में बीमारियों से संबंधित किसी भी प्रकार का रिसर्च डेटा नहीं है जिसके आधार पर आयुष मेडिकल छात्र नवीन रिसर्च कर सकें। इसके साथ ही कोई ऐसी स्टडी तकनीक नहीं दी गयी है जिसके आधार पर आयुष स्वास्थ्य कर्मियों को वैज्ञानिक बनने का प्रशिक्षण दिया जा सके ताकि वे समाज की और अधिक सेवा कर सकें।

 

8- प्राथमिक चिकित्सा देने वाले स्वास्थ्य कर्मियों भले ही वो आयुर्वेद के ही स्नातक हैं उन्हें यदि सही आधार व वातावरण नहीं मिला तो स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम जिस उद्देश्य से प्रारंभ किया गया है वह कभी पूरा नहीं हो पायेगा। ऐसे में मात्र जनरल फिज़िशिअन की ऐसी भीड़ तैयार हो रही है जिसे पूरी तरह से कार्य नहीं आता है फिर भी वह विशेषज्ञों वाला काम करने के लिए विवश है। देश में हो रही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ता चला रहा है क्योंकि बीमारियों का सही इलाज नहीं हो पा रहा है और अलग-अलग पैथियों में दूरी बढ़ती जा रही है। इसलिए चिकित्सा की मेनस्ट्रीम में उन्हें लाना ही होगा।

 

9- दोनों पैथियों के विचारों का समन्वय होना आवश्यक है। यह कार्य आसान नहीं होगा क्योंकि दोनों ही पद्धति के चिकित्सक अपनी ही विधा को श्रेष्ठ मानते हैं। रोगी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए दोनों पैथियों का समन्वय आवश्यक है जैसा चीन में होता है।

 

10- भारत की चिकित्सा प्लानिंग का उद्देश्य यह होना चाहिए कि रोगी को ठीक करना ही है और उसके लिए सभी प्रकार के चिकित्सा शास्त्र के दक्ष चिकित्सकों को साथ लेकर उनके ज्ञान का उपयोग करना है। आयुष चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा से जुड़े चिकित्सकों को अपने साथ एकसाथ लेकर चलने से ही हम अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधार पाएंगे।

 

डॉ.स्वास्तिक

चिकित्सा अधिकारी

(आयुष विभाग, उत्तराखंड शासन)

(लेखक से [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है ) sambhar courtsy navbharat times

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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