दिनांक 24 April 2018 समय 2:52 AM
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सौ करोड़ की बायोपिक, सवा करोड लोगों पर भारी बाबा रामदेव की आने वाली बायोपिक से होंगे कई दिल आहत

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ramdev-ang-maggi-image_14प्रदीप राजपूत, अंकल, भोपाल। भारतीय परंपरा में सामाजिक जातीय व्यवस्था से परे या यूं क हे इस सबसे से ऊंपर उठने का नाम सन्यास और संतत्व ग्रहण करना माना जाता है। शायद इसीलिए संत कबीर ने इस दोहे के जरिए बताने का प्रयास किया है कि जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान, मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान। अर्थात संत यानि जातीय व्यवस्था से ऊंपर उठ चुका उत्कृष्ट व्यक्ति। ऐसी सामाजिक एवं भारतीय परंपरा रही है कि भारतीय संत अपनी पुरानी जिंदगी को विस्मृत कर समाज एवं धर्म को नई दिशा देेने का काम करता रहा है। इसी कारण हमारे प्राचीन संत हिमालय की कंदराओं से ज्ञान प्राप्त कर ही समाज का मार्गदर्शन करने के लिए जमीं पर उतर आते थे। लेकिन वर्तमान में जैसे बाबाओं और संतों को भी राजनीतिक पगडंडी पर कदम-ताल करने की सूझ रही है। जिससे न केवल संतत्व पर सवाल उठने लगे है। पिछले पांच दस सालों में आशाराम बापू, राम रहीम, बाबा राम पाल, राधा मां जैसे संतों ने संत समाज पर उंगली उठाने का अवसर दिया है। इसी कारण आज समाज का विश्वास कहीं खंडित होता दिख रहा है।
वर्तमान में संत, साधु और समाज सेवक के रूप में ख्याति प्राप्त बाबा रामदेव का संतत्व एवं समाजसेवा से बड़ा दायरा राजनीतिक एवं आत्म प्रश्ंासा प्राप्त करने वाले बड़े आदमी के रूप में फेलता दिखाई दिया है। समाज ने उनके योग से रोग भगाने वाले योगी, सामाजिक क्रांति लाने वाले सामाजिक कार्यक र्ता के रूप में स्वरूप को न केवल देखा बल्कि आत्मसात भी किया है। इस समय स्वदेशी और विदेशी कंपनियों को भारतीय बाजार से लाभ कमाने की प्रवृत्ति से रोकने वाले उद्योगपति स्वरूप को को भी सहज भाव से स्वीकार कर लिया है। लेकिन अब उनका जो स्वरूप सामने आ रहा है, उससे आशंका सताने लगी है कि कहीं उनकी सौ करोड़ की लागत से शुरू होने वाली फिल्मी लाइफ सवा सौ करोड़ देश वासियों के लिए घातक एवं आदर्श को खंडित करने वाली साबित न हो जाए। इसका एक स्वरूप हम राधा मां और राम रहीम की रियल जिंदगी को रील लाइफ में बदलते और उसका बुरा हश्र होते देख चुके है। इस आशंका से हमारा मन तो कांप रहा है, क्योंकि बाबा रामदेव जो देश के लिए एक आदर्श संत स्वीकार हो चुके थे। लेकिन खतरा यह है कि अब विदेशी निवेश से बनने वाली उनकी बायोपिक उन्हें भी उसी मार्ग पर न ले जाए।
इस प्रकार की आशंका निर्मूल भी होगी क्योंकि पहला कारण तो यह है जिन विदेशी कंपनियों एवं विदेशी संस्कृति के ध्वजवाहकों की बाबा अभी तक के जीवन में विरोध करते रहे है। उन्हीं के द्वारा बाबा रामदेव पर बायोपिक फिल्म बनाई जा रही है। कहा जा रहा है इस फिल्म में विदेशी फिल्मकारों की पैसा लगाया जा रहा है। ऐसा न हो वे भारतीय समाज में संघर्ष पैदा करते हुए बाबा को उन्हीं के हथियार से मारने का प्लान लेकर आए हो। जैसा कि भारतीय इतिहास में ईस्ट इंडिया कंपनी ऐेसा कर चुकी है। और हम लंबे आजादी संघर्ष के बाद उनके शैतानी चंगुल से देश को मुक्त करा पाए। यहां देखने वाली बात यह है कि इस ईक्कीसवी सदी में विदेशी कंपनियों का सबसे ज्यादा विरोध बाबा ने किया है। जिसके फलस्वरूप ही देश की जनता ने उनके द्वारा बताए हर योग से लेकर माल को भी पूर्ण विश्वास के साथ आत्मसात किया जाता रहा है।
हां तो जैसा कि हम सब जानते है कि बाबा रामदेव पर बनने वाली बायोपिक के कुछ आरंभिक अंश जो धारावाहिक के रूप में टीव्ही चेनल पर प्रसारित भी होने लगे है। जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस बायोपिक के जरिए समाज को फिर से पचास साल पुरानी जातीय अहं के संघर्ष में धकेला जा सकता है। जिससे बाबा का चेहरा भी विशेष जातीय व्यवस्था में जकड़ा दिखाई देने लगा है। ऐसे में जिस संकट की आहट हमें सुनाई दे रही है। वह सच साबित न हो जाए।
राष्ट्र से अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संत किसी जातीय विशेष का व्यक्ति नजर आने लगा है। इससे सीधा-सीधा लाभ विदेशी कंपनियों और उनके आकाओं को होने वाला है। जितनी ज्यादा बायोपिक चलेगी, समाज में टूटन दिखाई देखी और आर्थिक लाभ कंपनियों को होगा। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बाबा ने किस आधार पर विदेशी निवेश आधारित बायोपिक पर अपनी सहमति जताई है। कहीं खुद बाबा ही विदेशी कंपनियों के इस मकडज़ाल में तो नहीं फंस रहे है। यदि ऐसा हो रहा है तो बहुत दुखद स्थिति होगी। देश के लिए भी और खुद बाबा के लिए भी। आज देश जिस आदर्श स्वरूप में बाबा रामदेव को योगी और भारतीय संस्कृति का हितचिंतक के रूप में देख रहा है। वह आदर्श खंडित हो सकता है।

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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