दिनांक 17 November 2018 समय 7:36 AM
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रूढ़ियों से निकलने की छटपटाहट

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रातनपंथी रिवाजों को छोड़ आधुनिकता की ओर चलने की रफ्तार गुर्जर समाज में बाकियों के मुकाबले धीमी है। गुर्जरों को अपने अतीत पर बेहद गर्व है लेकिन भविष्य की कोई साफ योजना उनके पास नहीं है। यह समुदाय आधुनिकता की दौड़ में आगे भी निकलना चाहता है लेकिन अपनी पुरानी रूढ़ियों, परंपराओं और कुरीतियों को छोड़ना भी नहीं चाहता।

सामाजिक नजरिए से गुर्जर देश की मध्यम किसान जातियों के वर्ग में आते हैं। जाट, यादव, राजपूत, भूमिहार, कुर्मी आदि जातियों के करीब-करीब बराबर ही इनकी गिनती होती है। इन बिरादरियों का हुक्का भी एक है। इनके बीच बेटी का संबंध तो नहीं है, पर रोटी का संबंध जरूर है। चौधरी चरण सिंह ने ‘अजगर’ के नारे पर अपना राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया था। अजगर यानी अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत। अगर आज शिक्षा, सत्ता, संपत्ति और सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी के आधार पर आकलन करें तो गुर्जर दूसरी समकक्ष जातियों से काफी पीछे हैं।
गुर्जर पिछड़े इसलिए रहे क्योंकि उन्होंने समय के मुताबिक खुद को नहीं बदला। इस समाज की सबसे नेगेटिव चीज है पुरुष और महिलाओं में भेदभाव करना। यहां सामाजिक-राजनीतिक कामों में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है। महिला आरक्षण के चलते ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख या जिला पंचायत के पदों पर बेशक गुर्जर महिलाएं जीतकर आ जाती हों लेकिन वे नाममात्र की ही प्रतिनिधि होती हैं। उनके नाम पर राजनीति घर के मर्द ही करते हैं। पर्दाप्रथा आज भी गुर्जरों में आम है।

हालांकि कुछ पढ़े-लिखे और शहरों में आ बसे गुर्जर परिवारों में यह रिवाज पीछे छूट गया है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। गुर्जरों में बेटा-बेटी के बीच बड़े स्तर पर भेदभाव किया जाता है। उनकी परवरिश और शिक्षा का पैमाना अलग-अलग रखा जाता है। आज भी बेटे का जन्मदिन या नामकरण संस्कार जहां जोर-शोर से मनाया जाता है। वहीं ऐसा कोई मौका याद नहीं जब किसी गुर्जर परिवार में बेटी होने पर दावत का न्यौता आया हो।
शादियों में फिजूलखर्ची और दहेज प्रथा ऐसी बुराई है, जो इस समुदाय के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है। कुछ लोग जब शादी में फिजूलखर्ची और दहेज पर रोक लगाने की बात करते हैं तो कई लोग तर्क देते हैं कि दहेज बेटी का हक है। सवाल है कि क्या शिक्षा बेटी का हक नहीं है? क्या बेटे के समान सुविधाएं उनका हक नहीं है? जो पैसा हम उनकी शादियों में अपनी झूठी शान के लिए खर्च करते हैं अगर उसे उनकी पढ़ाई पर खर्च करें और उन्हें योग्य बनाएं तो शायद हमारी शान ज्यादा बढ़े।

मैं कई ऐसी शादियों में गया हूं, जहां लड़का-लड़की दसवीं फेल। दोनों बेरोजगार। लेकिन दहेज में स्कॉर्पियो कार और 20-30 लाख रुपये का बाकी सामान। मैंने एक ऐसी भी शादी देखी जिसमें दूल्हा हेलिकॉप्टर में बैठकर ससुराल गया था। दो महीने बाद वह बाजार में लूट करता पकड़ा गया। अब वक्त यह चर्चा करने का नहीं है कि फलां ने शादी में कितना दहेज दिया, बल्कि इस पर चर्चा होनी चाहिए कि लड़का-लड़की कितने पढ़े-लिखे है और उनके रोजगार का जरिया क्या है?
अंतरजातीय या प्रेम विवाह पर इस समाज में पाबंदी है। देश की टॉप क्लास नौकरियों में गुर्जरों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। राजनीति में भी नारे लगाने वालों में ही मिलेंगे। इसके बावजूद हम खुद को सबसे महान जाति मानते हैं। यह झूठा गौरव और घमंड हमें आगे बढ़ने नहीं देता।
हमारे पैर के नीचे कोई जमीन नहीं। कमाल यह है कि फिर भी हमें यकीन नहीं।।
इन तमाम नकारात्मक बातों के बावजूद राहत की बात यह है कि गुर्जर समाज की नई पीढ़ी में विकास और आधुनिकता की ललक है। युवा पुरानी रूढ़ियों और पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर आगे बढ़ रहे हैं। समाज शिक्षा की ओर ध्यान दे रहा है। पुरानी बेड़ियों को तोड़ने की छटपटाहट है। बेशक हम जितनी जल्दी पुराने कवच से निकलकर नए समाज के साथ कदम से कदम मिला लेंगे, उतनी जल्दी समाज आगे बढे़गा।
अतीत भी महान था, भविष्य भी महान है। संभाल लो इसे, जो तुम थे जो वर्तमान है

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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