दिनांक 25 June 2018 समय 5:31 PM
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परीक्षा- पर-इच्छा को अपनी इच्छा बनाएं

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इन दिनों हर स्तर पर परीक्षा का दौर शुरू हो चुका हैं। स्कूलों से लेकर कॉलेज स्तर और प्रतियोगिता परीक्षाओं के जरिए केरियर संवारने की जद्दोजहद में बच्चे डूबे हुए है। ऐसे में सफलता और असफलता के बीच बच्चों का मन झूल रहा है। इस मन पर अभिभावकों, स्कूलों और आसपास के शैक्षिक वातावरण का तेजी से प्रभाव पड़ रहा है।  इसी बीच कई बच्चे जहां सफलता को लेकर पूर्ण आशांवित होते है तो कई ऊहापोह की स्थिति में बने रहते है। ऐसे छात्रों के लिए परीक्षा हऊआ बनकर दिमाग में तूफान मचाती है। जिसके परिणाम पेपर खराब होने से लेकर परीक्षा परिणाम घोषित होने तक नुकसान के रूप में सामने आते है। फिर सवाल उठता है कि आखिर ऐसे बच्चों जिनके मन में सफलता और खासकर अपेक्षित सफलता का ग्राफ नीचे जाता दिखाई देता है,उनके साथ किसको क्या करना चाहिए। आओ हम इस पर विचार करते है।
बोर्ड कक्षाओं की परीक्षाएं मार्च आरंभ होते शुरू हो जाएंगे। बच्चे स्कूलों से लेकर कोचिंग सेंटरों पर माथापच्ची कर रहे है। चूंकि साल भर लगभग सभी विद्यार्थियों और उनके गुरूओं ने मेहनत की नही है। जैसे ही परीक्षा के दिनों की उल्टी गिनती शुरू होती है। दिल और दिमाग पर भार बढऩा शुरू होने लगा है। इसी कारण आज का यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसे में क्या किया जाए कि परीक्षा जिसे पर इच्छा कहे अपनी इच्छा बन सके।
ऐसा कुछ करें छात्र- छात्र यह भूल जाए कि अभी तक हमने क्या किया, बल्कि अब यह ध्यान दे कि अब इतने दिनों में क्या कर सकते है। अतीत को भुलाकर परीक्षा के पेटर्न पर ध्यान देते हुए पढ़ाई पर फोकस करे। पढ़ाई को विषय बार बांटते हुए घंटों में तय करे। जहां समझने की जरूरत है वहां अपने शिक्षको, कोचिंग सेंटरों के शिक्षको और अपने अभिभावकों से शेयरिंग करें। तनाव को किसी भी हालत में हावी न होने दे। यह देखे जीवन की कोई भी सफलता जीवन से बड़ी नहीं हो सकती है। क्योंकि सफलता के लिए दूसरा और तीसरा अवसर मिल सकता है, लेकिन जीवन मिलने की कोई गारंटी नहीं होती है। आज की असफलता कल की बड़ी सफलता भी बन सकती है। बस असफलता से सीखते चले।
शिक्षक महोदय- सभी शिक्षकों से आग्रह है कि परीक्षा को भूत बनाकर भविष्य बर्बाद न होने पाए। बल्कि वर्तमान से जोड़कर भविष्य  में कुछ पंख उडऩे लायक देने में सहायक बने। बच्चों की क्षमतानुसार उन्हें अति व्यवहारिक दिशा निर्देश दे ताकि बच्चों में आत्मबल का विकास हो। आत्मबल और अल्प ज्ञान भी सफलता ला सकता है, लेकिन आत्मबल हीन छात्र ज्ञान होते हुए भी विस्मृति के अंधेरे में खोकर असफलता को प्राप्त कर सकता है।
अभिभावक महोदय- सबसे ज्यादा जिम्मेदारी अभिभावकों की होती है कि वे अपने असफलत सपनों को पूरा करने की जिद अपने बच्चों से न पाले। क्योंकि हर समय में हर व्यक्ति नया और नवीन होता है। ऐसे में तीस चालीस पुराने सपने को वर्तमान में ज्यों का त्यों पूरा करना या करवाना असंभव होते हुए अप्राकृतिक भी है। आम दिनों की तरह ही बच्चों से प्रेम करें, वातचीत करे उनकी भावनाओं को संबल प्रदान करे ताकि बच्चों के पर इच्छा निर्भर परीक्षा अपनी इच्छा में तब्दील हो सके। और आपके बच्चे का जीवन न केवल उसके लिए बल्कि आपके लिए भी उतना ही मूल्यवान है, इस कारण उसे अपनी अपेक्षाओं के बोझ तले न दबाए। क्योंकि कुछ खोना सबकुछ खोने से ज्यादा श्रेयस्कर है। फिर जरूरी नहीं है कि पिछली असफलता बोले तो पिछले दिनों अपेक्षा अनुरूप न की मेहनत आज भी उसी ढंाचे में ढली रहेगी। परीक्षा में सफलता कुछ दिनों खासकर इन दिनों में कारगर होगी। इसी आशा के साथ आगामी बातचीत में——-।

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About Pradeep Rajpoot

Pradeep Rajpoot is a social activist, businessman and editor in chief of Betwa Anchal weekly news paper.
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